

पैरों में कुछ भी नहीं पहनना, मौनपूर्वक साढ़े तीन हाथ प्रमाण भूमि पर नजर करके जीवों की दया करते हुए विहार करना उसी का नाम है.. पादविहार!! और इस प्रकार पादविहार करने वाले कहे जाते है.. पादविहारी!!!

संघ में आराधकों को पलंग, गद्दी वगैरह शरीर-सुविधाजनक साधनों का उपयोग करना नहीं होता। इस शयन-विधि को संथारा कहा जाता है। यह संथारा शुद्ध व जीवरहित भूमि पर करना होता है। इसी लिए कहते है.. भूमिसंथारी!!!

संघ में जूडने वाले सभी आराधकों को संघयात्रा में संपूर्णरुप से ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करना अनिवार्य होता है। जिसका ब्रह्मचर्य सुंदर - उसका मन निर्मल.. और निर्मल मन में परमात्मा का अवतरण सहज शक्य बनता है।

सचित्त याने सजीव। परिहारी याने त्याग करने वाले। सभी सजीव वस्तुओं का खान-पान के रुप में उपभोग करने का त्याग संघ में करना है। संघ में आराधक इस नियम का पालन सहज करते है, अतः इन्हें हम कहते है.. सचित्तपरिहारी!!!

दिन में एक ही बार निश्चित किये गये धार्मिक नियमानुसार भोजन लेना वह एकाहारी (एकासना) तप कहा जाता है। भोजन में भी त्यागवृत्ति को प्रधान रखकर आराधकगण एक ही बार आहार लेते है।

संघ में सम्यक्त्व के स्वीकार के साथ पूजा-प्रतिक्रमणादि जितनी भी आवश्यक क्रियाएँ है, उन्हें भी अनिवार्य रूप से करनी होती है। इस तरह सम्यग्दर्शन, ज्ञान व चारित्र का त्रिवेणी संगम छ'री पालक संघ में होता है।