तीर्थयात्रा के ग्यारह फलों में पहला फल है… आरंभ-समारंभ की निवृत्ति। आरंभ याने हिंसादि पाप व्यापार, संसारी जीव अपने शुद्ध चैतन्य आत्मा को भूलकर संसार में आसक्त होकर जो अर्थ व काम की प्रवृत्तियाँ करता है वह सभी प्रवृत्ति आरंभ गिनी जाती है। उसमें भी बड़े कारखाने, कर्मादान के हिंसक धंधे आदि तो महाआरंभ गिना जाता है। महाआरंभ नरक का द्वार है तो आरंभ तिर्यंचगति का द्वार है। तीर्थयात्रा में जुड़ने से संघपति एवं यात्रिक दोनों को सबसे बड़ा लाभ यह है कि संसार छूटा! 5-25 दिन के लिये भी संसार का कनेक्शन टूटने पर अर्थ-काम की अनुभूति पर कन्ट्रोल आता है और उस कारण धर्म-मोक्ष की प्रवृत्ति में मन जूडने से अध्यात्म-आत्मानंद की अनुभूतियों की भूमिका का सर्जन होता है।
साधु हमेशा के लिये संसारत्यागी होने से उन्हें आत्मिक-आनंद का खजाना मिला हुआ है। श्रावक भी यदि उस खजाने को पाने हेतु उत्सुक बनें हो तो आरंभ के त्याग का अवसर मिलते ही उसे स्वीकार लेता है। संघयात्रा में जुड़ने वाले पुण्यात्मा को इस तरह पहला लाभ हिंसादि पाप व व्यापार के त्याग का होता है। यहीं तो है… आरंभ-समारंभ की निवृत्ति!!
पुण्यानुबंधी पुण्य से प्राप्त संपत्ति-धन का सद्व्यय याने धन की सफलता। संसारी आत्मा द्रव्य याने धन को धारण करती है।
संघयात्रा करने व करवाने से द्रव्य-धन सफल बनता है। सातों सात क्षेत्रों की सुंदर भक्ति संघयात्रा के साथ होती है। एवं सात क्षेत्र की भक्ति में द्रव्य-विनियोग हो उसके जैसा दूसरा कोई श्रेष्ठ उपयोग नहीं। इस सात क्षेत्रों के साथ तीर्थयात्रा के आयोजन में जितना द्रव्य-धन का सद्व्यय होता है उतना ही सफल है। बाकी सब (अर्थ-काम में उपयुक्त धन) निष्फल है।
तीर्थयात्रा के साथ गाँव-गाँव के मंदिर, तीर्थ वगैरह में धन का सद्व्यय होता है। चढावा आदि के द्वारा भी धन का उपयोग होता है।
यह द्रव्य-धन की सफलता है। जिस प्रकार आरंभ से दुर्गति की प्राप्ति होती है, उसी प्रकार परिग्रह भी दुर्गति का कारण है। महापरिग्रह नरक का द्वार है। संघयात्रा में धन का सद् व्यय करने में परिग्रह और परिग्रह की ममता कम होती है। धन का सत्क्षेत्र में विनियोग होने से सत्क्षेत्र परिपुष्ट बनते हैं। पुण्यानुबंधी पुण्य का अपूर्व सर्जन होता है। दानादि प्रकरण ग्रंथ में कहा है कि – ‘संघ में उपयुक्त धन अनंत-अक्षय बन जाता है। जैसे समुद्र में प्रक्षिप्त जल अक्षय बनता है।’ बस! तीर्थयात्रा में इस तरह धन की सफलता होती है।
संघयात्रा में चतुर्विध श्रीसंघ का पदार्पण होता है। इस जगत में श्रेष्ठ कुटुंब चतुर्विध श्रीसंघ ही है। चार गति में रहे जीवों का एक ही साथ उद्धार करने के लिये श्रीसंघ ने चार रूप धारण किये हैं, ऐसा हितोपदेश ग्रंथ में बताया है।
श्रीसंघ 25वाँ तीर्थंकर है। तीर्थंकर के बाद श्रीसंघ पूज्य है। तीर्थंकर भी देशना के प्रारंभ में श्रीसंघ को नमस्कार करते है। ऐसा श्रीसंघ जिनके गृहांगण में पदार्पण करता है वह वास्तव में कृतपुण्य है। जैसे कि.. उनके आँगण में अकाल में मेघवृष्टि हुई, उनके घर कल्पवृक्ष फला हो, उनके हाथ चिंतामणि गया हो, ऐसा शास्त्र में उल्लेख किया गया है। ऐसे श्रीसंघ की वात्सल्यभक्ति खूब करनी चाहिये। संघ की भक्ति तीर्थंकरपद की भेंट देती है। संघ जो-जो भी आराधना-प्रभावना-सुरक्षा का कार्य करता है उन सभी का लाभ उसकी भक्ति करनेवाले को अनायास ही मिल जाता है। प्रत्येक श्रावक को संघभक्ति करनी चाहिये। किन्तु सामान्य संयोग में जो संघभक्ति होती है उसमें सीमित देश-प्रदेश या संख्या में ही लाभ मिल सकता है। जबकि तीर्थयात्रा के प्रसंग पर तो विविध देश, शहर व गाँवों से बड़ी संख्या में सभी तरह की आराधना से परिपूर्ण साधर्मिकों का योग मिलने से अत्यंत उमंग-उल्लास के साथ भावपूर्वक संघवात्सल्य हो सकता है। इसे हमारे पूर्वमहर्षियों ने श्रेष्ठ संघवात्सल्य कहा है।
सम्यग्दर्शन जिनशासन का आधार है। आराधना-प्रभावना का प्राण है। सम्यग्दर्शन हो तो ही ज्ञान भी सम्यक् बनता है और चारित्र भी सम्यक् बनता है। सम्यग्दर्शन की महिमा का गान जैनशासन में पग-पग पर किया गया है। यह सम्यग्दर्शन ही सम्यक्त्व, दर्शन, समकित, सच्ची दृष्टि, श्रद्धा आदि के नाम से पहचाना जाता है। यह सम्यगदर्शन मन के निर्मल बनने से प्राप्त होता है। अतः सम्यग्दर्शन प्राप्त होने के बाद उसे निर्मल-शुद्ध-निरतिचार रखना अनिवार्य है।
तीर्थयात्रा सम्यग्दर्शन को निर्मल व दृढ़ बनाती है, ऐसा विधान श्री आचारांगनिर्युक्ति आदि ग्रंथों में किया गया है। एक भी जीव सम्यग्दर्शन को प्राप्त करें या फिर प्राप्त सम्यग्दर्शन को निर्मल करें यहीं तो संघयात्रा का मुख्य उद्देश्य और महान लाभ है।
और यूं भी… तीर्थयात्रा के आयोजन द्वारा सम्यग्दर्शन की शुद्धि सहज शक्य बनती है। क्योंकि सम्यग्दर्शन को निर्मल बनाने वाले आलंबनों में जिनबिंब, जिनमंदिर, जिनवाणी, सातक्षेत्रादि की भक्ति, तीर्थप्रभावना, अनुकंपादि दान आदि के प्रचुर प्रबल निमित्त संघयात्रा के साथ प्राप्त होते हैं।
इस जगत में सबसे बड़ा उपकार सम्यग्दर्शन का दान करना है। सम्यग्दर्शन को निर्मल बनाने हेतु जो आलंबन-साधन हो उसे पूर्ण रूप में सहयोग के रुप में प्रस्तुत करना-खड़ा करना। जिससे जीवों को सम्यक्त्व की प्राप्ति हो, निर्मल हो, शुद्ध हो। ऐसा प्रयास छ’री पालक संघ में किया जाता है और संघ का पूरा वातावरण भी सहज रूप से ऐसा ही मिल जाता है। अतः ज्ञानी हमें कहते हैं… तीर्थयात्रा का चौथा फल सम्यग्दर्शन की निर्मलता है।
तीर्थयात्रा के द्वारा स्वजन-स्नेही-परिवार-कुटुंबीजनों का वास्तविक हित किया जा सकता है।
स्वजनादि को अर्थ-कामादि की सेवा में जोडना उसमें द्रव्यहित है, उसमें प्रायः भावहित नहीं है। वरन् वास्तविक एवं पारमार्थिक हित है। तीर्थयात्रा मोक्षमार्ग की साधना है और जीवों को मोक्षमार्ग की साधना में जोडने जैसा जगत में एक भी सच्चा हित नहीं है, ऐसा तत्त्वार्थसूत्र में वाचकवर श्री उमास्वातिजी महाराजा कहते है। तीर्थयात्रा के बहाने भी स्वजन साथ में जुडते हैं, लोकव्यवहारादि या लज्जादि से भी धर्मकार्य में प्रवृत्त होते हैं, उसके कारण पापकार्य से विराम लेते हैं, साधु का सत्संग-समागम प्राप्त होता है, आगे बढ़कर पूर्व के महापुरुषों के सिद्ध हस्त से अंजन किये गये विविध प्रतिमादि की पूजा आदि के द्वारा संघ के आराधक कर्म की लघुता को प्राप्त करते है। साथ ही सम्यग्दर्शनादि गुणों की स्पर्शना करते है और क्रमशः आगे बढ़कर मुक्तिमार्ग के आराधक-प्रभावक-रक्षक बन जाते हैं। इस प्रकार हित की परंपरा चलती है।
शादी आदि सांसारिक कार्यों में स्वजन-स्नेही जुड़ते हैं, उसमें सभी पाप का बंध करते है, जबकि धर्मकार्य में स्वजनों को जोड़ने से, जोड़ने वाले व जुड़ने वाले दोनों को अनेक आत्मिक लाभों की प्राप्ति होती है।
तीर्थयात्रा के पवित्र उद्देश्य से निकला हुआ संघ अनेक गाँवों की स्पर्शना करते हुए अपने लक्ष्य स्थान की ओर आगे बढ़ता रहता है। मार्ग के प्रत्येक गाँवों में आने वाले जिनमंदिर, उपाश्रय, धर्मस्थान आदि की स्पर्शना करके प्रत्यक्ष परिस्थिति का अवलोकन करता है। सभी गाँव के संघ शक्तिमान नहीं होते हैं। अतः उन गाँव के जिनमंदिर आदि जीर्ण हुए हो तो उनके जीर्णोद्धार का लाभ संघजन प्राप्त कर सकते हैं।
संघवी स्वयं अपने द्रव्य से या संघ समूह रूप से लाभ ले सकते हैं। या संघ में देवद्रव्य के निधि में से भी जिनमंदिर का जीर्णोद्धार हो सकता है। पौषधशाला वगैरह का उद्धार भी संघ के सहयोग से पूर्ण हो सकता है। शास्त्रकारों ने नूतन जिनमंदिर के निर्माण से जीर्णोद्धार में आठ गुणा लाभ-फल बताया है।
पूर्वकाल में संघपति को जितना खर्च होता उतना या उससे अधिक खर्च साथ में आनेवाले श्रीमंतों का होता। संघ आयोजन का पुण्य संघपति का गिना जाता फिर भी खर्च करके लाभ लेने का पुण्य तो कोई भी साधर्मिक अर्जित कर सकता है।
तीर्थ याने जैनप्रवचन (द्वादशांगी), प्रभु द्वारा प्रस्थापित चतुर्विध संघ और प्रथम गणधर। तीर्थोन्नति याने तीर्थप्रभावना। तीर्थ का गौरव, तीर्थ की महिमा, तीर्थ का प्रभाव बढ़े वैसे कार्य करने। जिस तीर्थ की यात्रा करने जाय वो तीर्थ सभी के हृदय में चिरप्रतिष्ठित बन जाय ऐसे आयोजनों को तीर्थोन्नति कही जाती है। चतुर्विध श्रीसंघ का आदर-सत्कार-पूजन-गौरव के साथ तीर्थोन्नति का ऐसा अद्भूत माहौल खड़ा होता है कि देखने-सुनने वालों को लगे कि – ‘धन्य जिन शासन! धन्य इनके देव-गुरु व धर्म! अहो! कितना महान!!’
इस तरह तीर्थ-संघ-जैनधर्म की प्रशंसा-अनुमोदना के उद्गार सहज आ जाते हैं… ऐसे आयोजनो को तीर्थोन्नति या तीर्थप्रभावना कही जाती है। जैनशासन की उन्नति करने वाले विशिष्ट प्रभावक विद्यमान न हो तब देव-गुरु के संबंधवाले सभी अनुष्ठान त्रिकरण की शुद्धि से और अनेक जीवों में धर्म के बीज बोने पर प्रभावक बनते हैं, ऐसा सम्यक्त्व सप्ततिकादि शास्त्रों में उल्लेख है। श्रावक जन भी तीर्थयात्रा, जिनमंदिर, जिनबिंब, प्रतिष्ठा, साधर्मिक वात्सल्य आदि विविध अनुष्ठानों के द्वारा तीर्थोन्नति कर प्रभावक बनते है, ऐसा आचारप्रदीप ग्रंथ में बताया है।
तीर्थयात्रा का आयोजन करना यह शक्तिसंपन्न श्रावक के लिये जिनाज्ञा है। मोक्ष के लक्ष्य के साथ, विधि और जयणा के पालन पूर्वक तीर्थयात्रा का आयोजन करने से जिनाज्ञा का पालन होता है। सातों क्षेत्र संबंधी अनेक जिनाज्ञा का तीर्थयात्रा के साथ पालन संभव होता है।
तीर्थयात्रा के साथ जिनवचन-प्रवचन का श्रवण नियमित होता है। सद्गुरु के श्रीमुख से प्रतिदिन तीर्थमाहात्म्य और तीर्थयात्रा का आयोजन करने वाले संघपति व तीर्थयात्रा में जुड़ने वाले यात्रिक आदि के कर्त्तव्य पर विवेचन होता है। संसार के आरंभादि से निवृत्त होने पर मन स्थिर-शांत-स्वस्थ बना होने से जिनवाणी का असर अच्छा होता है। आत्मा को आनंद का लाभ होता है। जिनवाणी के नियमित श्रवण से आत्मा धीरे-धीरे मोक्षमार्ग की ओर सार्थक कदम बढ़ा कर गतिशील बनती है।
तीर्थयात्रा एक ऐसा सुनहरा अवसर है कि उसमें गुरुमुख से सुनी हुई अनेक जिनाज्ञाओं को साकार करने का अवसर मिलता है। धन की शक्ति से युक्त आत्मा तीर्थादि में धन का व्यय कर दानधर्म का लाभ ले सकती है। शरीर और मन की शक्तिवाली आत्मा निर्मल ब्रह्मचर्य का पालन कर शीलधर्म का लाभ प्राप्त कर सकती है। उसी तरह खाने-पीने की जंजाल से बचकर तपधर्म का आराधक बना जा सकता है। उसी प्रकार संसार के कार्यों से छूटकर प्रशस्त भावना में आत्मा भावित बनकर आनंद में झूम उठती है।
तीर्थंकर नामकर्म के बंध हेतु जो जो कारण शास्त्रों में वर्णित है, उसमें से बहुत-से कारण तीर्थयात्रा में सहज रूप से प्राप्त होते हैं। अतः विधिपूर्वक तीर्थयात्रा का आयोजन करने वाले व तीर्थयात्रा में जुड़ने वाले पुण्यात्माओं को तीर्थंकर नामकर्म का बंध हो उसमें कोई आश्चर्य नहीं। तीर्थंकर नामकर्म के बंध हेतु एक भी उपाय के सेवन से यदि तीर्थंकर नामकर्म का बंध होता हो तो जहाँ एक साथ इतने सारे उपायों का आसेवन नित्य होता हो वहाँ तीर्थंकर नामकर्म का बंध निश्चित हो सकता है। तीर्थंकर की भक्ति से भक्त स्वयं तीर्थंकर बन जाता है। यहीं जिनशासन की मौलिक विशेषता है। यहाँ दोषों का त्याग कर गुणसंपन्न बनने वाले आत्मा के लिये सर्वोच्च पदवी याने तीर्थंकर पदवी सुरक्षित है। तीर्थयात्रा का आयोजन करने वाले पुण्यात्मा तो विशिष्ट रूप से तीर्थंकर पद प्राप्ति हेतु अधिकारी बनते हैं। क्योंकि उन्होंने संसाररूप कुए में डूबते अनगिनत आत्माओं को हाथ का आलंबन देकर उबारा है।
तीर्थयात्रा के द्वारा तीर्थप्रभावना होती है और तीर्थप्रभावना से प्रभावक को तीर्थंकर पद की प्राप्ति होती है। श्राद्धदिनकृत्य में बताया है कि – श्रीकृष्णजी और श्रेणिक महाराजा जैसे पुण्यात्माओं ने तीर्थ की प्रभावना के द्वारा तीर्थंकर नामकर्म को प्राप्त किया था।
तीर्थयात्राकारक और यात्रिक को मुक्ति करतलगत बन जाती है।
तीर्थयात्रा का अंतिम लक्ष्य मोक्ष ही है। मोक्ष प्राप्ति हेतु तीर्थंकरभगवंतों ने धर्मतीर्थ की स्थापना की है। धन से छूटने दानधर्म, काम-भोग से छूटने शीलधर्म, खाने-पीने से छूटना, तपधर्म और संसार के भावों से छूटना भावधर्म है। इस तरह संसार में रहकर किये जाने वाले दान, शील, तप और भावधर्म यह आंशिक-मोक्षप्राप्ति है। इस प्रकार आंशिक मोक्ष की प्राप्ति करते-करते ही संसारत्याग होकर सर्वविरति की शुद्ध आराधना करते अंत में पूर्ण मोक्ष प्राप्त होता है। विषय और कषाय जब पूर्णरूप से नाश होते है, कर्म के बंधन पूरे छूट जाते हैं, राग-द्वेषादि का सर्वथा क्षय हो तब आत्मा मुक्ति को प्राप्त करती है। तीर्थयात्रा में आयोजित सभी अनुष्ठान इसीलिये ही होते हैं। वाह-वाह, नामना-कीर्ति, प्रशंसा-बहुमान, इहलोक-परलोक के सुख आदि प्राप्त करने हेतु तीर्थयात्रा होती नहीं, इसके लिये प्रभु की आज्ञा भी नहीं है। तीर्थ यात्रा का अनुष्ठान आयोजित करने का उसी आत्मा को मन होता है कि जो आसन्नभव्य हो, निकट में ही मोक्षगामी हो, सच्चे भाव से तीर्थयात्रा का आयोजन करने वाले एक भव में मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। ऐसा काल न हो तो तीन, पांच या आठ भव में अवश्य मोक्ष को प्राप्त होता है।
श्री पुंडरीक गणधर ने प्रभु श्री ऋषभदेव परमात्मा की आज्ञा को पाकर श्री शत्रुंजय गिरिराज की ऐसी तीर्थयात्रा की इससे उनका तो मोक्ष हुआ ही उनके साथ जुड़े हुये पाँच करोड पुण्यात्माओं को भी मोक्ष हुआ। भावपूर्ण आयोजित तीर्थयात्रा इस प्रकार स्व-पर के मोक्ष को समीप ला देती है।
जिससे मोक्षफल की प्राप्ति होती हो, उससे दूसरा क्या नहीं मिल सकता? देवताई-मानवीय सुख की प्राप्ति हेतु तीर्थयात्रा करो ऐसा शास्त्रकार महर्षि नहीं फरमाते है। क्योंकि ये सब तो आनुषांगिक फल है, मुख्य फल तो मोक्ष है। अतः मोक्षसुख की प्राप्ति के लक्ष्य के साथ तीर्थयात्रा करते-करते पुण्यानुबंधी पुण्य के योग से ऐसे सुख मिल भी जाय तो भी वें सुख आत्मा को नुकसान नहीं करते। शक्कर पर बैठी हुई मक्खी की तरह वो जीव आनुषांगिक फल के रूप में प्राप्त सुख का आस्वाद लेते सद्गुरु की प्रेरणा को पाकर वो सुख का त्याग कर देते हैं। संयम पथ को स्वीकार कर शीघ्र मुक्ति को प्राप्त करते हैं।
संघयात्रा-तीर्थयात्रा में जुड़ने वाले पुण्यात्मा को तीर्थयात्रा के प्रभाव से ऐसे-ऐसे उत्तम फलों की प्राप्ति होती है।
कर्पूरप्रकर और उपदेशसार आदि ग्रंथों में तीर्थयात्रा से शुभध्यान की प्राप्ति होती है ऐसा बताया है। आर्तध्यान और रौद्रध्यान के सभी निमित्त संसारयात्रा में रहे हुए हैं। उसका तीर्थयात्रा के कारण त्याग होता है और धर्मध्यानादि के पूरे आलंबन यहाँ मिलते है। अतः ऐसे आत्मा को शुभध्यान में आना सहज बन जाता है।
इस तरह छ’री पालक तीर्थयात्रा संघ के 11 लाभ शास्त्रों में वर्णित हैं।

